Thursday, 23 July 2020

अनुपम साधना

"उत्तर बिहार में हिमालय से उतरने वाली नदियों की संख्या अनगिनत है। कोई गिनती नहीं है, फिर भी कुछ लोगों ने उनकी गिनती की है। आज लोग यह मानते हैं कि यहां पर इन नदियों ने दुख के अलावा कुछ नहीं दिया है। पर इनके नाम देखेंगे तो इनमें से किसी भी नदी के नाम में, विशेषण में दुख का कोई पर्यायवाची देखने को नहीं मिलेगा। लोगों ने नदियों को हमेशा की तरह देवियों के रूप में देखा है। हम उनके विशेषण दूसरी तरह से देखें तो उनमें आपको बहुत तरह-तरह के ऐसे शब्द मिलेंगे जो उस समाज और नदियों के रिश्ते को बताते हैं। कुछ नाम संस्कृत से होंगे। कुछ गुणों पर होंगे और एकाध अवगुणों पर भी हो सकते हैं।

इन नदियों के विशेषणों में सबसे अधिक संख्या है- आभूषणों की। और ये आभूषण हंसुली, अंगूठी और चंद्रहार जैसे गहनों के नाम पर हैं। हम सभी जानते हैं कि ये आभूषण गोल आकार के होते हैं- यानी यहां पर नदियां उतरते समय इधर- उधर सीधी बहने के बदले आड़ी, तिरछी, गोल आकार में क्षेत्र को बांधती हैं- गांवों को लपेटती हैं और उन गांवों का आभूषणों की तरह श्रृंगार करती हैं। उत्तर बिहार के कई गांव इन 'आभूषणों' से ऐसे सजे हुए थे कि बिना पैर धोए आप इन गांवों में प्रवेश नहीं कर सकते थे। इनमें रहने वाले आपको गर्व से बताएंगे कि हमारे गांव की पवित्र धूल गांव से बाहर नहीं जा सकती, और आप अपनी (शायद अपवित्र) धूल गांव में ला नहीं सकते।"

ये अनुपम मिश्र के एक लेख का छोटा सा भाग है जो आज मैंने रवीश कुमार के प्राइम टाइम पे सुना। लेख का शीर्षक है "तैरने वाला समाज डूब रहा है". सुना तो लगा की इतनी सुंदर बात और लोग भी पढ़ें तो कितना अच्छा हो। अच्छी बातें बाढ़ का समाधान भले ही ना हों, विचारों के सूखे से ग्रसित हमारे मनों को कुछ राहत तो दे ही सकती हैं।

इतनी इतनी किताबें पढ़ लीं हमने साहित्य के नाम पे लेकिन उसमे कितनी कम बार ऐसा हुआ होगा कि किसी वाक्य ने हमे कुछ क्षण के लिए ही सही, शून्य कर दिया हो। ऐसा लगे कि पूरी ज़िंदगी का पढ़ा लिखा धरा का धरा रह जाएगा लेकिन ऐसी बात बोलने या लिखने के लिए पता नहीं कौन सी साधना करनी पड़ती होगी।

शायद समस्या विचार से ज्यादा संस्कार की है; संस्कृति की है. संस्कृति एक सम्पूर्ण व्यवस्था का सार है और संस्कृति की रूपरेखा हमारी भाषा में प्रतिबिंबित होती है. संस्कृति विहीन भाषा का सबसे अच्छा परिचायक है हिंसात्मकता. वो हिंसात्मकता जो उपभोग की भाषा में अटी पड़ी है. अब हम प्रकृति से भी उपभोगता की हैसियत से बात करने लगे हैं. उससे अपना 'अधिकार' मांगने निकल पड़ते हैं. यदि वो हमारे विकास में बाधा दे तो उसे अपना दुश्मन मानने में भी हम देरी नहीं करते. इस हिंसात्मकता में हमारे अलावा सब कुछ तुच्छ है, जिसे हम जरुरत के हिसाब से मोर-मरोड़ सकते हैं. इस संस्कृति में हम ही हम हैं. बांकी सब शून्य है. जीवित होना साझा स्थिति है. अगर हमारी नदियां ही मरणासन्न हों तो हममे कितना जीवन बचा रह गया होगा. 2019 के चुनाव के समय YouTube पे एक वीडियो  देखते हुए एक अद्धभुत दर्शन हुआ. पत्रकार ने यमुना पे नांव से कचड़ा जमा करने वाले बिहार के एक लड़के से पुछा की उसे दिल्ली शहर कैसा लगता है. उसने कहा "यहाँ के लोग काला खाते हैं, काला बोलते हैं, काला पहनते हैं. इसीलिए वो भी काले हैं, उनकी नदी भी काली है." कितना सूक्ष्म दर्शन था जीवन का उस अनपढ़ लड़के के मन में.  

ऐसा तो बिलकुल नहीं हो सकता की सूचना के इस अद्धभुत दौर में चीज़ों को जानने समझने वाले लोगों की कमी होगी. ये जरूर हो सकता है की जिन खांचों में ये ज्ञान समेटा जाता हो वो कृत्रिम हो चले हों. जो समाज 'मेरा, तुम्हारा, जरुरी, गैरजरूरी' की भाषा में खुद को झोंक दे वो नदियों को अलंकार की तरह कैसे देख सकता है. अंग्रेजी में नदियों, तालाबों को water bodies कहा जाता है. मृत लोगों के शरीर को भी body ही कहा जाता है. किसी अनजान व्यक्ति को somebody, anybody कहने का रिवाज है. सार में कहें तो आत्मीयता का अभाव दर्शाने वाला शब्द है body. शायद निर्जीवता दर्शाने वाला भी. वहीं  जिस परंपरा का जिक्र इस लेख में अनुपम जी करते हैं, उसमे अपनत्व से इतर कोई अलग body है ही नहीं. चीज़ें हमारे लिए नहीं हैं लेकिन हमारी हैं, हमारा हिस्सा हैं. इसीलिए उनके सुन्दर सुन्दर नाम हैं, उनके बारे में गीत हैं.

अफवाह उड़ी की शायद coronavirus चमगादड़ों से इंसानों में फैला है तो internet पे चमगादड़ों का सफाया कर देने तक की बात चल पड़ी. सुंदरबन में रहने वाले लोग सदियों से आदमखोर बाघों के हांथों अपनी जान गवाते रहे हैं. एक पत्रकार ने उनसे पुछा की क्या वो भी इन बाघों को मारते हैं. जवाब दे रहे इंसान ने ऐसे कान पकड़ लिए जैसे बाघ को मारना तो दूर की बात, ऐसा सोचना भी अक्षम्य पाप हो. "बाघ हमें याद दिलाता है की जंगल में हमारी सीमा तय है. जो लालच में ज्यादा अंदर चला जाता है उसी को बाघ मारता है. बाघ की भी आत्मा है. वो भी जीव है. हम भी जीव हैं. सब का जंगल पे बराबर का हक़ है"

जिस दुनिया में अपने घरवालों के अलावा सब somebody हो जाते हैं, उसी दुनियां में कहीं आज भी कोई अपने परिवार के हत्यारे बाघ को भी बस एक body मानने को तैयार नहीं है. उसी दुनिया में कोई था जिसने अपना ज्ञान किताबों के साथ मुफ्त में आने वाले खांचों में नहीं भरा था.

संस्कार के अलावा भी एक गुण है जिसका अकाल सा नज़र आता है चारों तरफ. ये गुण है विनम्रता का. मैंने सुना है की management और finance की क्लासों में ये मंत्र सिखाया जाता है की "There's nothing called free lunch." सब कुछ लेन देन के सिद्धाँत पे चलता है. शायद इसी सोच का नतीजा है meritocracy का जहर. ये विचार की हम जो कुछ भी हैं, अपनी मेहनत और लगन के बल पे हैं और इतनी मेहनत की है तो मज़ा करना तो हमारा अधिकार है. इस मज़े में किसी और का या पूरे समाज का मज़ा ख़राब हो तो हम क्या करें. लेन देन का सिद्धांत है. जिसे ज्यादा चाहिए वो मेहमत कर के ले सकता है. जिसके पास कम है वो और मेहनत करे. अब इस लेन देन के खेल में मूक प्रकृति बेचारी क्या करे. वो किसे बताए की एक नहीं, आजतक दुनिया में जितने भी लोगों ने जितनी भी बार लंच किया है, फ्री का ही तो किया है. उसे तो किसी ने बदले में कुछ नहीं दिया. ना उसने बदले में कुछ मांगना अपना अधिकार समझा. मुर्ख प्रकृति का दाखिला कोई IIM में करवाए तो बात उसके पल्ले पड़ेगी.

जो समाज ये मानने को आमादा हो की उसके ज्ञान से लेकर उसका भोजन तक सबकुछ उसी का अर्जित किया हुआ है, उसे विनम्रता का,आभार का पाठ कैसे पढ़ाया जाए. जो जीवन ही free में मिला है, उसका आभार शून्य होकर ही तो व्यक्त किया जा सकता है. ऐसी शून्यता का एहसास करने वाला समाज ही अपनी नदियों को उपयोग की वस्तु से बढ़कर, गांव का अलंकार कह सकता है. इस कथा में गांव और समाज खुद को ही निर्जीव body मान लेता है जिसमें जान नदी, पहाड़ और पेड़ फूकते हैं. वो ऐसा समाज है जहाँ कसाई भी जानवर को काटने से पहले उससे माफ़ी मांगता है.

'मेरा तुम्हारा' करने वाला समाज आज मूर्खता के चरम पे प्रकृति से भी 'मेरा तुम्हारा' की भाषा में बात करना चाहता है. प्रकृति को ये भद्दी भाषा आती ही नहीं. इसीलिए वो हमसे अब बात नहीं करती है. अनुपम मिश्र को पढ़िए. दूसरे लोगों को भी पढ़िए. क्या पता पढ़ने के क्रम में क्षण भर की शून्यता का अनुभव आपको कोई नई भाषा सिखा दे.

https://hindi.indiawaterportal.org/content/taairanae-vaalaa-samaaja-dauuba-rahaa-haai/book/541

https://mansampark.in/author/anupammishr/

Wednesday, 27 May 2020

पाठक के नाम संदेश

तुम 
तुम जो ये कविता पढ़ रहे हो
तुम नहीं हो मेरे प्रिय पाठक 
मैं तुम्हारे लिए नहीं
तुम्हारे खिलाफ लिख रहा हूँ
इस उम्मीद में की 
कविता लिखने के पहले 
जो बेचैनी मेरे अंदर थी 
वो कविता पढ़ने के बाद 
तुम्हारे अंदर हो
इस उम्मीद में की
एक दिन तुम्हारी चेतना 
तुम्हारी हिंसक शांति 
के खिलाफ विद्रोह कर देगी
इस उम्मीद में
की कुछ तो बच जाएगा
सब ख़त्म होने क बाद भी
तुम्हारे अंदर
मैं ये कविता लिख रहा हूँ 

Thursday, 21 May 2020

नाकामयाब समय के कामयाब लोग

नाकामयाब समय के कामयाब लोग कैसे होते हैं?
मुझे तो लगता है कि वो
घर जाते ही उतार देते हैं अपनी चमड़ी
और डाल देते हैं उसे वाशिंग मशीन में
फिर आंखों को, नाक को, कानों को
सीलबंद अलमारी में सहेज कर रख देते हैं
और अंत में रह जाते हैं सिर्फ दांत
जिनसे वो अपनी दिनभर की कामयाबी को रातभर चबाते हैं

Saturday, 8 June 2019

बैंगलोर राजधानी

हिलती डुलती ट्रेन पे मैं सुन्न बैठा हूँ
इस असमंजस में की ये कैसी यात्रा है
जिसमें एक आवारा गति की दिशा में
अबोध बढ़ते जा रहे हैं हम सब
हम ऐसी अनोखी निर्बलता से लदे हुए हैं
की दुख भी उबासी में मिल गया है
लेकिन इस खालीपन में भी कुछ है
जो तोड़ रहा है  मेरे मन की चुप्पी
खिड़की के बाहर जो स्थिर साधारण दुनिया है
वो खिड़की के अंदर की कृत्रिम नीरस व्यवस्था
के विपरीत, कितनी मनमोहक है
इन छोटे जर्जर मकानों के बाहर की रोशनी
मानो अपनी क्रूर अव्यवस्थित टिमटिमाहट में
सभ्यता का बोझिल इतिहास दिखा रही हो
वहीं खिड़की के इस तरफ व्यवस्था ने
धीरे धीरे सभ्यता को शौचालय तक धकेल दिया है
और गति बढ़ती जा रही है

Thursday, 31 January 2019

परतें

जब खत्म कर दूं ये कविता
तो खोलना तह बा तह
इस कविता की परतें
सबसे ऊपर मिलेगा वही पुराना विद्रोह
वही शरीर की बदलती जरूरतों को ढकने की पोषाक
थोड़ा गुरुर और थोड़ी सी हिम्मत

और नीचे जाओगे तो देखोगे
की पड़ी हैं मेरी मैली आदतें
मेरा पूर्वाग्रह और मेरी कमजोरियां
जिनको न जाने किस आकार में मोड़-मरोड़ के बना रखा है मैंने वास्तुशिल्प का अद्वितीय नमूना और रंग दिया है उन्हें बाज़ार के विचारों से ताकि आने जाने वालों को आभास न हो उनकी कुरूपता का

जब पहुंच जाओ तीसरी परत तक
तब लेना एक विराम
और नाज़ुक हांथों से उठाना मेरी बचपन में बनाई दुनिया की तस्वीर
ढूंढोगे तो मिलेगा उस तस्वीर में एक सिहरता हुआ यथार्थ जो ढका होगा न जाने कितनी जलती हुई परतों के मोम से
ये विकृतियों का मोम है जो टपकता चला गया मेरी दुनिया की तस्वीर पर
तब जब मैं बना रहा था अपनी दुनिया

शायद एक दुनिया बनाने के लिए दूसरी को खोखला करना ही नियम हो दुनिया का
पर अगर हटा पाओ ठंडी मोम तो देखना उस खोखली तस्वीर के आर-पार
और शायद तुम पाओगे की इस कविता की कोख में रखी है एक पोटली हार

हर उस बार जब मैं गिर के उठ नहीं पाया था
जब मैंने झुका लिया था सिर
जब मान लिया था मैंने खुद को बेबस
जब खो दिया था मैंने अपना विश्वास
जब नोचने लगा था मैं अपनी आत्मा
जब स्वीकार कर ली थी मैंने अपनी दयनीयता
तब                      तब                     तब
तभी शायद हुआ था सृजन इन परतों का
उस हार के पहले बीज से

और जितना हारते जाते हैं हम
उतनी ही जटिल होती जाती हैं हमारी कविताएं

अब जब भी लिखूंगा अगली कविता
तो कुछ परतें हटाऊंगा
कविता छोटी सही पर सरल बनाऊंगा।

Friday, 23 March 2018

UNKNOWN

Come looking for me someday
In the ruins of this unknown night
Come with your decorated wreaths & triumphant faces
Having celebrated your self-images
Come and scrounge this unknown night and its irksome eeriness
Nobody has been here and nobody's left
Only somebody kept waiting for nobody to come.

Come looking for me someday
In the ruins of this unknown night
Come and try to make sense of what's left
There's some noise bleeding out of the shattered glass
There's chunks of stinking honesty all over the floor
There's a feeble utterance hanging loosely on the wall
All meaning lies in a big heap in the corner of the night,
Drenched with reality and stupidity and time.

Come looking for me someday
In the ruins of this unknown night
Come and clean up this mess atleast
You mustn't preserve the unknown
Gather me in a box and label me 'fragile'
And dump me in an abandoned mailbox somewhere
Address me to the next unknown night
To be dispatched in perpetuity.

Sunday, 21 December 2014

Shouldn't we Hope

Hope has been regarded quite profoundly by radical thinkers as a bardic, lyrical & baseless human value built upon unreasonable pretensions. Existentialism advocates that through hope humans seek to leap and deny the arbitrariness of life. In a universe where nothingness trumps humanity & logic seems desirable, hope is abstractly contrived. Hope can never influence fate. Hope, through a blind act of human confidence, seeks to explain everything. Thus as Albert Camus remarks "The absurd becomes God and the inability to understand becomes the existence that illuminates everything!!!"                                                                                                                                            I do not dismiss any of these charges. Hope in all its commonness has indeed been levied upon us by time or through ancestry. My wish is to rediscover hope as an understated gem of the human intellect. I do not wish to hold on to a blinding hope of vileness and ignorance.I do not wish for some great idea that will transcend my life and give it meaning or in other words simply betray it. I wish to hope for a coherent & indistinguishable recognition of the implacable grandeur of reality. My hope is that randomness is celebrated over importance & that the freedom that comes with unimportance is cherished.


Shouldn’t we hope?
And what else is there but hope
Though Hope doesn’t make us great or wise
It makes us weaker, inferior, susceptible to humanity
Hope transcends into faith
It is a deceitful agreement 
 making hopelessness bearable.
Yet, today I choose to hope.

I am opening more doors today
For I do not have strength enough to deny
I cannot choose reluctance over irrelevance
I cannot deny myself
I am too real, too abstract to escape
And thus I hope I can respect reality in it's entirety
I hope I can engage and confront
I hope I have Hope.

I choose to cry today
For in tears I see the hope of trust.
A hope that I can accept what is,
Universally inexistent, yet undeniably mine
This love and this gladness
This anxiety and this revulsion.
I hope my happiness betrays my disappointment
That my poetry never abandons my tears.

I choose to pray today
For in faith I see the hope of belief
A belief that I can be greater than my fears
That knowledge will not be accompanied by apathy
That worthiness willn’t be worshipped over tranquillity
That prayer willn’t be born out of isolation, escapism
I hope faith becomes our spectacles and not our eyes
I hope life grants us all, Simplicity of hope

I have a choice today to make
A choice having no varying consequence
for my distinction lies not between hope and despair
but between beginnings, ends & exclamations
I choose my life over my existence
Existence is forgetfulness;it is stagnant,perforated,lacks virtue
Life is fluid, It is a miraculous engine of love
My hope is to become life, to become a mad poet's delight.